FIR कैसे दर्ज की जाती है?
FIR दर्ज कराने के लिए थाने जाकर घटना बताएँ — पुलिस उसे लिखेगी, आपको पढ़कर सुनाएगी, और आपके हस्ताक्षर के बाद FIR की मुफ्त कॉपी देगी। संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज करना पुलिस की कानूनी बाध्यता है, और Zero FIR किसी भी थाने में दर्ज हो सकती है। पुलिस मना करे तो लिखित शिकायत SP को भेजें (धारा 173(4) BNSS), फिर भी न हो तो मजिस्ट्रेट को आवेदन दें (धारा 175(3) BNSS)।
FIR (प्रथम सूचना रिपोर्ट) वह दस्तावेज़ है जिससे आपराधिक कानून हरकत में आता है। 2024 से यह प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत चलती है, जिसने आम नागरिक के अधिकार और मज़बूत किए हैं।
FIR कब दर्ज होती है?
संज्ञेय अपराधों में — यानी गंभीर अपराध जिनमें पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है: चोरी, लूट, मारपीट, धोखाधड़ी, अमानत में खयानत, यौन अपराध, अपहरण। छोटे मामलों (मामूली कहासुनी, साधारण मानहानि) में NCR दर्ज होती है और रास्ता मजिस्ट्रेट से होकर जाता है।
FIR दर्ज कराने के कदम
- थाने जाएँ — जहाँ घटना हुई वहाँ का थाना सबसे सही, लेकिन Zero FIR किसी भी थाने में दर्ज कराई जा सकती है; पुलिस “इलाका हमारा नहीं” कहकर मना नहीं कर सकती।
- घटना बताएँ — तारीख, समय, जगह, कौन लोग, क्या हुआ, गवाह, सबूत। पुलिस आपकी बात लिखेगी और पढ़कर सुनाएगी।
- e-FIR: BNSS में इलेक्ट्रॉनिक FIR की सुविधा है (राज्य पोर्टल/ऐप); 3 दिन के भीतर हस्ताक्षर करने होते हैं।
- पढ़कर ही हस्ताक्षर करें — कुछ गलत लिखा हो तो पहले ठीक करवाएँ।
- मुफ्त कॉपी लें — यह आपका कानूनी अधिकार है। FIR नंबर, तारीख और धाराएँ नोट करें।
पुलिस FIR दर्ज न करे तो
- SP/पुलिस कमिश्नर को लिखित शिकायत (धारा 173(4) BNSS) — डाक/ईमेल से, प्रमाण रखें।
- फिर भी न हो तो मजिस्ट्रेट को आवेदन (धारा 175(3) BNSS) — मजिस्ट्रेट पुलिस को FIR दर्ज करने का आदेश दे सकते हैं।
- ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश (सुप्रीम कोर्ट, 2013): संज्ञेय अपराध की सूचना पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है — पुलिस के पास टालने का विवेकाधिकार नहीं है।
FIR के बाद क्या होता है?
- पुलिस जाँच: बयान, सबूत, ज़रूरत पर गिरफ्तारी
- BNSS के तहत पुलिस को सूचना देने वाले को 90 दिन में जाँच की प्रगति बतानी होती है
- जाँच के बाद चार्जशीट या क्लोज़र रिपोर्ट — क्लोज़र रिपोर्ट का आप विरोध कर सकते हैं
ज़रूरी बातें
- अपनी लिखित शिकायत साथ ले जाएँ और रिसीविंग लें
- तथ्यों पर टिके रहें — बढ़ा-चढ़ाकर लिखवाना बाद में केस को नुकसान पहुँचाता है
- तुरंत खतरा हो तो पहले 112 पर कॉल करें
- झूठी FIR कराना खुद अपराध है
यह लेख सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। अपने मामले के लिए योग्य वकील से सलाह लें।
Frequently asked questions
क्या FIR किसी भी थाने में दर्ज हो सकती है?
हाँ — Zero FIR किसी भी थाने में दर्ज कराई जा सकती है, चाहे घटना कहीं भी हुई हो। थाना उसे '0' नंबर से दर्ज कर सही क्षेत्र के थाने को भेज देता है। इलाके के नाम पर मना करना गैरकानूनी है।
क्या FIR दर्ज कराने के पैसे लगते हैं?
नहीं — FIR दर्ज कराना और उसकी कॉपी पाना बिल्कुल मुफ्त है। कोई पैसा माँगे तो यह खुद अपराध है; शिकायत करें।
क्या ऑनलाइन FIR हो सकती है?
हाँ, BNSS में e-FIR मान्य है। ज़्यादातर राज्यों के पोर्टल/ऐप पर कुछ श्रेणियों (वाहन चोरी, गुमशुदगी, साइबर ठगी — cybercrime.gov.in) की e-FIR होती है। 3 दिन के भीतर हस्ताक्षर ज़रूरी हैं।
पुलिस FIR दर्ज नहीं कर रही — सबसे तेज़ रास्ता क्या है?
लिखित शिकायत SP को भेजें (धारा 173(4) BNSS) और प्रमाण रखें; फिर भी न हो तो मजिस्ट्रेट के यहाँ धारा 175(3) BNSS की अर्ज़ी दें। सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी फैसले के बाद संज्ञेय अपराध में FIR टालना पुलिस के लिए गैरकानूनी है।







