आपसी सहमति से तलाक कैसे होता है?
आपसी सहमति से तलाक (हिंदू विवाह अधिनियम, धारा 13B) के लिए पति-पत्नी का कम से कम 1 साल से अलग रहना और दोनों की रज़ामंदी ज़रूरी है। फैमिली कोर्ट में संयुक्त याचिका (पहली मोशन) के बाद 6 महीने की कूलिंग अवधि होती है — जिसे सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले के बाद अदालत माफ भी कर सकती है — फिर दूसरी मोशन पर तलाक की डिक्री मिल जाती है। कुल समय आमतौर पर 6–18 महीने; छूट मिलने पर 2–4 महीने।
आपसी सहमति से तलाक भारत में शादी खत्म करने का सबसे तेज़ और सबसे कम कड़वाहट वाला तरीका है — दोनों पक्ष तलाक, पैसों और बच्चों पर सहमत होते हैं, और अदालत दो सुनवाइयों में विवाह समाप्त कर देती है।
ज़रूरी शर्तें
- शादी को कम से कम 1 साल हुआ हो
- पति-पत्नी कम से कम 1 साल से अलग रह रहे हों (अलग जीवन — ज़रूरी नहीं कि अलग घर)
- दोनों की स्वतंत्र सहमति हो, और गुज़ारा भत्ता (एलिमनी), बच्चों की कस्टडी और स्त्रीधन/संपत्ति पर समझौता तय हो
प्रक्रिया — दो मोशन
पहली मोशन
दोनों पक्ष समझौते की शर्तों के साथ फैमिली कोर्ट में संयुक्त याचिका दाखिल करते हैं; अदालत बयान दर्ज करती है।
कूलिंग अवधि — 6 से 18 महीने
कानून में दूसरी मोशन से पहले कम से कम 6 महीने की प्रतीक्षा है। अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (सुप्रीम कोर्ट, 2017) के बाद अदालतें यह अवधि माफ कर सकती हैं — जहाँ सुलह की कोई संभावना नहीं बची हो और सभी विवाद तय हो चुके हों। ऐसे मामलों में तलाक 2–4 महीने में भी हो जाता है।
दूसरी मोशन और डिक्री
दोनों पक्ष दोबारा सहमति की पुष्टि करते हैं (डिक्री से पहले कोई भी पक्ष सहमति वापस ले सकता है), और अदालत तलाक की डिक्री पारित कर देती है।
ज़रूरी दस्तावेज़
- विवाह प्रमाणपत्र और शादी की तस्वीरें
- दोनों के पते और पहचान के दस्तावेज़
- हस्ताक्षरित समझौता — एलिमनी, कस्टडी, संपत्ति, स्त्रीधन
- 1 साल अलग रहने का प्रमाण (जैसे किराया एग्रीमेंट, पत्राचार)
खर्च
कोर्ट फीस मामूली है; वकील की फीस शहर और मामले की जटिलता के हिसाब से आम तौर पर ₹15,000–₹1,00,000+। अच्छी तरह लिखा समझौता सबसे अच्छा निवेश है — यही आगे के झगड़ों से बचाता है।
यह लेख सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। अपने मामले के लिए योग्य वकील से सलाह लें।
Frequently asked questions
आपसी सहमति से तलाक में कितना समय लगता है?
6 महीने की कूलिंग अवधि के साथ आमतौर पर 7–12 महीने। अगर अदालत कूलिंग अवधि माफ कर दे (2017 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद संभव), तो 2–4 महीने में भी तलाक हो सकता है।
क्या 6 महीने की अवधि माफ हो सकती है?
हाँ। अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) के बाद यह अवधि अनिवार्य नहीं, विवेकाधीन है। लंबा अलगाव, असफल मध्यस्थता और सभी मुद्दों का तय हो जाना — इन आधारों पर अदालत छूट देती है।
क्या एक पक्ष बीच में सहमति वापस ले सकता है?
हाँ — डिक्री होने तक सहमति बनी रहना ज़रूरी है। दूसरी मोशन से पहले कोई भी पक्ष पीछे हट सकता है; तब मामला विवादित (contested) तलाक की ओर जा सकता है। इसीलिए समझौते की शर्तें मज़बूती से लिखवाएँ।
क्या दोनों को कोर्ट जाना पड़ता है?
आम तौर पर दोनों मोशन में दोनों पक्ष पेश होते हैं। NRI या वास्तविक कठिनाई की स्थिति में अदालतें वीडियो-कॉन्फ्रेंस से पेशी की इजाज़त दे रही हैं; सीमित मामलों में पावर ऑफ अटॉर्नी से भी।







